गुनाहों का देवता — धर्मवीर भारती
मैंने गुनाहों का देवता का 85वाँ संस्करण पढ़ा है। यह बात अपने आप में मुझे थोड़ी खास लगती है—1949 में लिखा गया उपन्यास आज भी नए पाठकों को उसी तरह छू रहा है।
और सच कहूँ तो, इसे पढ़कर जो महसूस हुआ, उसे शब्दों में ठीक-ठीक बताना मेरे लिए मुश्किल है।
चंदर और सुधा की कहानी प्रेम की कहानी है, लेकिन मेरे लिए यह सिर्फ प्रेम और विरह की कहानी नहीं रही। इसमें प्रेम, आदर्श, त्याग, अहं, सामाजिक सोच और इंसानी मन की कई परतें एक साथ दिखाई देती हैं। कई जगह लगा कि पात्रों के फैसले सही हैं या नहीं, यह तय करने से ज्यादा जरूरी है यह समझना कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं।
भारती जी की भाषा मुझे सबसे ज्यादा पसंद आई। सरल, लेकिन भीतर तक उतर जाने वाली। कई जगह पढ़ते-पढ़ते रुकना पड़ा। कुछ पंक्तियाँ दोबारा पढ़ीं और कुछ को बस थोड़ी देर महसूस किया।
चंदर का आदर्शवाद, उसका भीतर का संघर्ष और धीरे-धीरे बदलता हुआ मन मुझे बहुत देर तक सोचने पर मजबूर करता रहा। शायद इसी वजह से यह कहानी आज भी पुरानी नहीं लगती।
यह उन किताबों में से है जिनका अंत पढ़कर किताब बंद तो कर देते हैं, लेकिन कहानी वहीं खत्म नहीं होती।
85वाँ संस्करण पढ़ते हुए अगर 2026 में भी यह कहानी मुझे इतना विचलित और भावुक कर सकती है, तो शायद यही इस किताब की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
इसे पढ़ने के बाद मेरे पास इसकी रेटिंग से ज्यादा एक भावना है—कुछ किताबें पढ़ी नहीं जातीं, वे आपके भीतर थोड़ी देर के लिए रह जाती हैं।







